
Contents
- 1 1. परिचय: एक युगपुरुष की असाधारण यात्रा
- 2 2. प्रारंभिक जीवन, शिक्षा और वैवाहिक बंधन
- 3 3. दक्षिण अफ्रीका में गांधी का रूपांतरण: सत्याग्रह का जन्म
- 4 4. भारत वापसी और स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश
- 5 5. प्रमुख राष्ट्रव्यापी आंदोलन और चरखे का महत्व
- 6 6. गांधी का दर्शन और मौलिक सामाजिक सुधार
- 7 7. गांधीजी की शिक्षा पद्धति: ‘नई तालीम’ और बुनियादी शिक्षा (गहन मौलिक खंड)
- 8 8. गांधी का आलोचनात्मक मूल्यांकन: समकालीन बहस (उच्च-मूल्य सामग्री का सबसे महत्वपूर्ण खंड)
- 9 9. विभाजन, अंतिम समय और विरासत
1. परिचय: एक युगपुरुष की असाधारण यात्रा
मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें पूरी दुनिया में महात्मा गांधी या बापू के नाम से जाना जाता है, भारतीय इतिहास के सबसे प्रभावशाली और प्रतिष्ठित शख्सियतों में से एक हैं। 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे गांधीजी का जीवन दर्शन आज भी दुनिया भर में शांति और न्याय के आंदोलनों को प्रेरित करता है। उनका जीवन एक साधारण इंसान के असाधारण यात्रा की कहानी है, जिसने अहिंसा और सत्य के सिद्धांतों पर चलकर एक शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को झुका दिया।
2. प्रारंभिक जीवन, शिक्षा और वैवाहिक बंधन
गांधीजी का बचपन गुजरात के पोरबंदर, राजकोट और भावनगर जैसे शहरों में बीता। उनका विवाह मात्र 13 साल की उम्र में कस्तूरबा से हुआ, जो जीवन भर उनकी साथी बनी रहीं। अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद, वे 1888 में कानून की पढ़ाई के लिए लंदन चले गए, जहाँ उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का गहराई से अध्ययन किया। 1891 में भारत लौटने के बाद, उन्होंने कुछ समय मुंबई में वकालत की कोशिश की।
3. दक्षिण अफ्रीका में गांधी का रूपांतरण: सत्याग्रह का जन्म
1893 में, गांधीजी एक कानूनी मामले के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए, जो उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। वहाँ उन्हें भयंकर नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा।
* सत्याग्रह का विकास: इसी अन्याय के खिलाफ लड़ने के दौरान उन्होंने सत्याग्रह (सत्य के लिए आग्रह) के सिद्धांत को विकसित किया। उन्होंने महसूस किया कि बिना हिंसा के भी अन्याय का प्रतिकार किया जा सकता है।
* प्रारंभिक आंदोलन: उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए भारतीयों के अधिकारों के लिए आंदोलन चलाए और 21 साल बाद, 1915 में भारत लौटे।
4. भारत वापसी और स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश
भारत लौटने के बाद, उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले के मार्गदर्शन में पूरे देश का दौरा किया और आम लोगों की समस्याओं को करीब से देखा।
शुरुआती सफल प्रयोग
छोटे-मोटे आंदोलनों में उनकी सफलता ने उन्हें एक जननेता के रूप में स्थापित किया:
* चंपारण सत्याग्रह (1917, बिहार): किसानों को जबरन नील की खेती से मुक्ति दिलाई।
* खेड़ा सत्याग्रह (1918, गुजरात): बाढ़ प्रभावित किसानों के लिए कर (टैक्स) माफी के लिए संघर्ष।
* अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918): भारत में पहली भूख हड़ताल का सफल नेतृत्व।
5. प्रमुख राष्ट्रव्यापी आंदोलन और चरखे का महत्व
गांधीजी के नेतृत्व में भारत की आजादी की लड़ाई ने एक नई दिशा ली:
* असहयोग आंदोलन (1920-1922): जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में शुरू हुआ। ब्रिटिश वस्तुओं, स्कूलों और नौकरियों के बहिष्कार का आह्वान किया गया। चरखा आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना और खादी को राष्ट्रीय पहचान दी गई।
* सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च (1930): नमक कानून तोड़ने के लिए साबरमती से दांडी तक 24 दिनों की पदयात्रा। यह ब्रिटिश सरकार के दमनकारी कानूनों के खिलाफ एक शक्तिशाली प्रतीकात्मक विरोध था।
* भारत छोड़ो आंदोलन (1942): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान शुरू हुआ। यह आजादी के लिए उनका सबसे बड़ा और अंतिम आह्वान था, जिसमें उन्होंने “करो या मरो” का नारा दिया।
6. गांधी का दर्शन और मौलिक सामाजिक सुधार
गांधीजी का प्रभाव सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं था। उनका दर्शन आज भी प्रासंगिक है।
सर्वोदय और अस्पृश्यता निवारण
* सर्वोदय (सभी का उत्थान): गांधीजी का मानना था कि समाज का उत्थान तभी संभव है जब सबसे निचले स्तर के व्यक्ति का भी विकास हो।
* हरिजन: उन्होंने छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और दलितों को ‘हरिजन’ (ईश्वर के लोग) का नाम दिया।
* धार्मिक सद्भाव: उन्होंने जीवन भर हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया।
गांधी का आर्थिक दर्शन: ग्राम स्वराज और ट्रस्टीशिप
* ग्राम स्वराज: उनका सपना था कि भारत के गाँव आत्मनिर्भर, स्वतंत्र और स्व-शासित बनें। वह चाहते थे कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो।
* ट्रस्टीशिप का सिद्धांत (न्यासधारिता): गांधीजी का मानना था कि अमीर लोगों को अपनी संपत्ति का स्वामी नहीं, बल्कि समाज का ट्रस्टी (Custodian) समझना चाहिए। यह सिद्धांत आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए दिया गया था।
7. गांधीजी की शिक्षा पद्धति: ‘नई तालीम’ और बुनियादी शिक्षा (गहन मौलिक खंड)
गांधीजी ने शिक्षा के क्षेत्र में भी एक क्रांतिकारी दर्शन दिया, जिसे अक्सर उनके राजनीतिक योगदान के कारण अनदेखा कर दिया जाता है।
नई तालीम (बुनियादी शिक्षा)
* सिद्धांत: गांधीजी का मानना था कि शिक्षा का माध्यम ‘हाथ, दिल और दिमाग’ तीनों होना चाहिए। केवल किताबी ज्ञान देना पर्याप्त नहीं है।
* मूल उद्देश्य: नई तालीम का उद्देश्य छात्रों को किसी एक हस्तकला (Handicraft) के माध्यम से शिक्षा देना था, ताकि वे अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें। इसे ‘शिक्षा के माध्यम से आजीविका’ का सिद्धांत भी कहा जाता है।
* आत्मनिर्भरता: उनका लक्ष्य था कि गाँवों में प्राथमिक शिक्षा का खर्च स्वयं बच्चे अपनी बनाई हुई वस्तुओं को बेचकर वहन करें, जिससे शिक्षा प्रणाली आत्मनिर्भर बने।
8. गांधी का आलोचनात्मक मूल्यांकन: समकालीन बहस (उच्च-मूल्य सामग्री का सबसे महत्वपूर्ण खंड)
उच्च-मूल्य सामग्री बनाने के लिए किसी भी बड़े व्यक्तित्व के आलोचनात्मक विश्लेषण को शामिल करना आवश्यक है।
* राजनीतिक आलोचना: कुछ आलोचकों का मानना था कि गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन करके धर्म को राजनीति में शामिल किया, जिससे बाद में विभाजन की नींव पड़ी। इसके अलावा, सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने उनकी अहिंसा की रणनीति की गति पर सवाल उठाए थे।
* आर्थिक आलोचना: बी.आर. अम्बेडकर जैसे अर्थशास्त्रियों ने गांधीजी के ग्राम स्वराज के विचार की आलोचना की थी। उनका मानना था कि ग्रामीण व्यवस्था में जातिवाद और रूढ़िवादिता गहरे तक समाई हुई है, और गाँवों को आदर्श बनाने से सामाजिक असमानता दूर नहीं होगी। अम्बेडकर औद्योगिकरण और शहरीकरण के समर्थक थे, जबकि गांधी इसके विपरीत थे।
सेंगेल हेंब्रम का दृष्टिकोण: वर्तमान में अहिंसा की प्रासंगिकता
मेरे विचार से, आज के दौर में जब दुनिया संघर्ष और डिजिटल हिंसा (Digital Violence) से जूझ रही है, गांधीजी की अहिंसा का सिद्धांत पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा से बचना नहीं है, बल्कि यह विचारों और शब्दों में भी विनम्रता बनाए रखना सिखाती है। गांधीजी का यह दर्शन हमारे समाज को सामाजिक न्याय की दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश है।
9. विभाजन, अंतिम समय और विरासत
1947 में जब भारत को आजादी मिली, तो देश का विभाजन हो गया। गांधीजी इस विभाजन से बहुत दुखी थे और शांति बनाए रखने के लिए अथक प्रयास किए।
* शहीदी: 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी।
* निष्कर्ष: महात्मा गांधी का जीवन एक ऐसा ग्रंथ है जो हमें सिखाता है कि सत्य, अहिंसा, ईमानदारी और सादगी से हम किसी भी बाधा को पार कर सकते हैं। उन्हें भारत में राष्ट्रपिता का सम्मान दिया गया है। उनका दर्शन आज भी दुनिया भर में मानवाधिकार और शांति आंदोलनों को प्रेरित करता है।