
परिचय दीपावली – प्रकाश का पर्व
परिचय दीपावली – प्रकाश का पर्व
दीपावली: प्रकाश का पर्व और संताली संस्कृति में गौ-पूजा का अनूठा महत्व
परिचय: एक पर्व, अनेक रूप
दीपावली या दीपाली भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और लोकप्रिय पर्व है। “प्रकाश का पर्व” कहलाने वाली यह दीपावली अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। जहाँ हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध धर्मावलंबी इसे अपने-अपने ढंग से मनाते हैं, वहीं भारत के आदिवासी समुदाय भी इसे अपनी अनूठी सांस्कृतिक पहचान के साथ मनाते हैं। इस लेख में, हम दीपावली के महत्व के साथ-साथ संताली आदिवासी परंपरा पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करेंगे, जहाँ यह पर्व सोहराय के रूप में पशुधन और प्रकृति के सम्मान का महापर्व बन जाता है।
संताली सोहराय पर्व की पौराणिक कथा और गौ-पूजा का इतिहास
संताली परंपरा में, दीपावली (या सोहराय) की जड़ें सीधे सृजन के इतिहास से जुड़ी हुई हैं, जो इसे अत्यंत मौलिक और महत्वपूर्ण बनाती हैं। यह पर्व मानव और पशुधन के बीच अटूट रिश्ते को समर्पित है।
पौराणिक कथा के अनुसार, मरंगबुरु, जाहेर आओ, मन मणे और तूरूई ने मिलकर इंसानों को सृजन किया था। इंसानों को बचाए रखने और पालने-पोसने के लिए, उन्होंने गाय, भैंस, सांड, बकरी, आदि पशु दिए। इनमें से गायों ने माँ की तरह और भैंस व सांड ने पिता की तरह इंसानों की सेवा की।
हालांकि, समय के साथ, इंसानों का घमंड इतना बढ़ गया कि उन्होंने अपने पालतू पशुओं के साथ बुरा व्यवहार करना शुरू कर दिया। वे पशुओं के घर-द्वार के अंदर थूकने लगे, उन्हें झाड़ू या डंडों से मारने लगे, जिससे पशु बहुत दुखी हुए।
पशुओं ने मरंगबुरु से विनती की, “आपने हमें इंसान को पालने के लिए भेजा था, लेकिन हमारे जीवन में सुख-शांति नहीं है। हम इस दुख में इंसानों को कैसे पालेंगे?”
यह सुनकर मरंगबुरु बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने फैसला किया कि इंसानों को अपने गलत कर्मों का फल भुगतना होगा। मरंगबुरु ने तत्काल यह आदेश दिया कि सभी गाय, भैंस और सांड जंगल में छुप जाएं। यह घटना मग बोंगा (संताली कैलेंडर का एक महीना) के दौरान हुई।
पशुओं के चले जाने के बाद, इंसानों को बहुत सालों तक मुश्किल और तकलीफ झेलनी पड़ी, क्योंकि कृषि और जीवन के लिए वे पूरी तरह पशुधन पर निर्भर थे। अंत में, उन्होंने मरंगबुरु से अपनी गलती की माफी मांगी।
मरंगबुरु ने उन्हें प्रायश्चित करने और माफी मांगने के लिए कहा। जब मरंगबुरु ने पशुओं को वापस बुलाया, तो वे वापस आना नहीं चाहते थे। तब मरंगबुरु ने उन्हें समझाया कि अगर वे वापस नहीं आएंगे, तो उनके द्वारा सृजित मानव सृष्टि खत्म हो जाएगी। मरंगबुरु ने वादा किया कि अब इंसान उनके गोबर और गोमूत्र को भी पवित्र मानेंगे और उसका उपयोग जीवन में करेंगे। इसी प्रतिज्ञा के बाद पशुधन वापस आया। यही वह दिन था जब पहली गोट पूजा (Gote Puja) हुई, और इसी तरह दीपावली या सोहराय पर्व की शुरुआत हुई।
सोहराय: प्रकृति और पशुधन की लक्ष्मी पूजा
संताली सोहराय पर्व को आदिवासियों की लक्ष्मी पूजा भी माना जाता है। जहाँ हिंदू समाज में धन-संपत्ति (जैसे सोना-चांदी) को महत्व दिया जाता है, वहीं आदिवासी समाज में असली धन पशुओं और प्रकृति को माना जाता है। हमारी धन-संपत्ति जल, जंगल, जमीन, और पशुओं से मिली है। इसलिए सोहराय, जल-जंगल-जमीन-प्रकृति और पशुओं के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है।
संताली परंपरा में, गाय को माता लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है। इस दिन, गाय को नहला-धुलाकर उसके सींगों पर तेल और सिंदूर लगाकर सजाया जाता है। उसके सींगों पर धान और नए उगने वाले पौधे लगाए जाते हैं, जो आने वाली फसल की समृद्धि का प्रतीक होते हैं।
दीपावली (सोहराय) का 5 दिवसीय आयोजन
संताली सोहराय और सामान्य दीपावली के कुछ दिन एक-दूसरे से जुड़ते हैं, लेकिन सोहराय पूरी तरह से पशुधन और प्रकृति केंद्रित होता है:
| दिवस | संताली सोहराय परंपरा (विशेष महत्व) | सामान्य दीपावली दिवस |
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| पहला दिन | बोंगा गुरु/उम बोंगा: इस दिन सभी प्रभु या देवताओं को स्नान कराया जाता है और पूजा की जाती है। | (धनतेरस या छोटी दिवाली से जुड़ा) |
| दूसरा दिन | गोट पूजा (गोट बोंगा): पशुओं को वापस बुलाए जाने की पौराणिक कथा को याद करते हुए, गौशाला में विशेष पूजा की जाती है। | (नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली से जुड़ा) |
| तीसरा दिन | गोड़ा पूजा (गोड़ा बोंगा): पशुओं को रखने के स्थान (अखाड़े/गोड़ा) की पूजा की जाती है। | अमावस्या / लक्ष्मी पूजन (मुख्य दीपावली) |
| चौथा दिन | गया आल / खुंटाऊ: गायों को खूंटे से बांधकर सामुदायिक उत्साह में नचाया जाता है। यह त्योहार के आनंद का मुख्य भाग है। | गोवर्धन पूजा / अन्नकूट |
| पांचवा दिन | जाजले/हारियोर: इस दिन गाँव के लोग एक साथ नाचते-गाते हुए घर-घर जाते हैं और बाहर जमा की गई खाने की वस्तुओं को इकट्ठा करके सामूहिक भोज करते हैं। | भैया दूज |
दीपावली की परंपराएँ, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
दीपावली केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। त्योहार से पहले घरों की अच्छी तरह से सफाई की जाती है। गोबर और मिट्टी के लेप से घर सजाए जाते हैं, और आंगन में पारंपरिक रंगोली बनाई जाती है। शाम को दीपक जलाकर वातावरण को उज्ज्वल बनाया जाता है। यह पारिवारिक और सामाजिक प्रेम को बढ़ाता है।
आधुनिक समय में भी यह त्योहार अपना महत्व नहीं खोता है। बाजारों में नए कपड़े, आभूषण, और उपहारों की जबरदस्त खरीदारी होती है, जिससे यह आर्थिक दृष्टि से भी बड़ा पर्व बन जाता है। हालांकि, अब लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हो रहे हैं और पटाखे जलाने को सीमित करके पर्यावरण अनुकूल दीपावली मनाने पर जोर दे रहे हैं।
निष्कर्ष
संताली परंपरा के कारण हमारे लिए गाय का महत्व दीपावली में और बढ़ जाता है, और हमारे परिवार में इनकी पूजा होती है। यह त्योहार हमें अंधकार से प्रकाश की ओर और हमारी अनूठी संताली परंपराओं की ओर ले जाता है। हमारे लिए, दीपावली हर्ष, उत्साह और प्रकाश का पर्व है। जब पूरा गाँव मिलकर दीये जलाता है, सामूहिक नृत्य करता है, और रंगोली से घरों को सजाता है, तो एक अद्भुत आनंद मिलता है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि प्रकृति, पशु और समुदाय का सम्मान ही हमारी असली समृद्धि और खुशियों का आधार है।