भारत-की-जनजातीय-संस्कृति: प्रकृति से जुड़ाव, अद्वितीय विरासत और भविष्य की राह

 

Tribal Culture of India

Contents

1. परिचय: विविधता में एकता और आदिम संस्कृति का महत्व 🇮🇳

भारत विविधताओं का देश है। यहाँ अनगिनत जातियों, धर्मों, भाषाओं और परंपराओं का मेल है। इस विशाल सांस्कृतिक ताने-बाने में, जनजातीय संस्कृति एक अद्वितीय और प्राचीन स्थान रखती है। जनजातीय जीवन का गहरा जुड़ाव प्रकृति से है। उनका रहन-सहन, विश्वास, पर्व, नृत्य, गीत, कला और भाषाएँ—सब कुछ प्राकृतिक दुनिया के साथ उनके सामंजस्य को दर्शाते हैं। जहाँ आधुनिक विकास ने कई परंपराओं को प्रभावित किया है, वहीं जनजातीय संस्कृति आज भी अपनी विशिष्ट पहचान को मज़बूती से संरक्षित रखती है।

2. जनजातीय समुदायों का परिचय: ‘आदिवासी’ और संवैधानिक पहचान

शब्द “आदिवासी” का अर्थ है ‘आदि काल से रहने वाले लोग’। इन्हें भारत का मूल निवासी माना जाता है। भारत का संविधान उन्हें अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes – ST) के रूप में मान्यता देता है।

 * प्रमुख निवास क्षेत्र: जनजातीय आबादी मुख्य रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, नागालैंड, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा और असम जैसे राज्यों में केंद्रित है।

 * सांस्कृतिक विविधता: जनजातीय समाज अपनी अनूठी भाषाओं, वेशभूषा और परंपराओं से पहचाना जाता है। इनकी संख्या करोड़ों में है, जो इन्हें भारत की सांस्कृतिक विविधता का एक अविभाज्य अंग बनाती है।

3. जनजातीय संस्कृति की मुख्य विशेषताएँ: प्रकृति-केंद्रित जीवन

जनजातीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसका प्रकृति-केंद्रित जीवन है।

 * जीवन रेखा: वन, पर्वत, नदियाँ और खेत उनके लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि उनकी जीवन रेखा और पूजनीय स्थल हैं।

 * कला और दर्शन: उनके गीतों, कहानियों और नृत्यों में पृथ्वी, जल, वायु, पौधे और पशुओं का एक केंद्रीय और सम्मानजनक स्थान होता है।

 * सामूहिक भावना: वे सामूहिक जीवन (Collective Living) में विश्वास रखते हैं, जहाँ हर ग्रामीण एक-दूसरे के सुख-दुख में भागीदारी करता है।

सेंगेल हेंब्रम का दृष्टिकोण: हमारी संस्कृति और आधुनिकता का संतुलन

मेरे अनुभव में, जनजातीय संस्कृति सिखाती है कि संपत्ति या व्यक्तिवाद से ऊपर समुदाय और प्रकृति है। आज की उपभोक्तावादी दुनिया में, हमें पर्यावरण के साथ संतुलन बनाने के लिए उनके जीवन दर्शन से प्रेरणा लेनी चाहिए। हमारा जीवन जंगल से शुरू होकर जंगल पर ही खत्म होता है, और यही हमारे मूल्यों की जड़ है।

4. भाषाएँ, लोकगीत और नृत्य: संस्कृति की आत्मा

जनजातीय संस्कृति की आत्मा उसके संगीत और नृत्य में बसती है।

भाषाएँ और मौखिक साहित्य

भारतीय जनजातियाँ कई भाषाएँ बोलती हैं, जो मुख्य रूप से चार भाषा परिवारों से आती हैं। संथाली, मुंडारी, हो, गोंडी, भीली, कुरुख, और खड़िया प्रमुख हैं।

 * मौखिक परंपरा: उनका अधिकांश साहित्य मौखिक (Oral) होता है, जो लोकगीतों, गाथाओं और कहावतों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाता है।

प्रमुख लोकनृत्य और संगीत

फसल कटाई, विवाह या त्योहारों जैसे अवसरों पर लोग ढोल की थाप पर सामूहिक रूप से गाते और नाचते हैं।

| नृत्य का नाम (Dance Form) | प्रमुख जनजाति (Major Tribe) | अवसर/विशेषता (Occasion/Feature) |

| सोहराई नृत्य (Sohrai Dance) | संथाली | फसल कटाई और मवेशी पूजा। |

| रीना नृत्य (Rina Dance) | गोंड | विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किया जाने वाला नृत्य। |

| नगा युद्ध नृत्य (Naga War Dance) | नागा | वीरता और शिकार का प्रदर्शन। |

| करम नृत्य (Karma Dance) | उरांव, मुंडा | प्रकृति पूजा और सामूहिक उत्सव। |

5. पर्व, कला और आस्थाएँ: प्रकृति का सम्मान

प्रकृति और कृषि से जुड़े त्योहार

जनजातीय त्योहार प्रकृति और कृषि चक्र से गहराई से जुड़े होते हैं:

 * सरहुल (Sarhul): वसंत और फूलों का त्योहार, जिसमें साल के पेड़ की पूजा की जाती है।

 * करमा (Karma): वृक्षों और प्रकृति की पूजा, भाईचारे का प्रतीक।

 * सोहराई (Sohrai): फसल कटाई और मवेशी/पशु धन के प्रति आभार व्यक्त करने का त्योहार।

 * माघ परब (Magh Parab): नए साल और नई फसल के आगमन का उत्सव।

जनजातीय कला और शिल्प

जनजातीय कला अत्यंत समृद्ध है और यह उनकी दैनिक जीवनशैली को दर्शाती है।

 * चित्रकला: पिथौरा, भील पेंटिंग और वारली कला (महाराष्ट्र) जैसी भित्ति और फर्श चित्रकलाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं।

 * शिल्प: लकड़ी, बाँस और मिट्टी से खिलौने और घरेलू सामान बनाए जाते हैं। महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा के साथ सुंदर चांदी और मनकों के आभूषण पहनती हैं।

विश्वास और धर्म: प्रकृति पूजक

जनजातियाँ मुख्य रूप से प्रकृति-पूजक होती हैं। वे सूर्य, चंद्रमा, नदियों, पहाड़ों और पेड़ों की पूजा करते हैं, जिन्हें वे ‘बोंगा’ (पवित्र आत्मा) या शक्ति मानते हैं।

 * प्रमुख देवता: संथाली “मारांग बुरु” (पहाड़ के देवता) को अपना सर्वोच्च देवता मानते हैं, जबकि गोंड समुदाय “फेन पेन” नामक देवताओं की पूजा करता है।

6. सामाजिक संरचना और आजीविका

सामाजिक संरचना: समानता और निर्णय प्रक्रिया

जनजातीय समाज समानता और सामूहिक भागीदारी पर आधारित होता है।

 * भेदभाव का अभाव: यहाँ जाति आधारित भेदभाव लगभग न के बराबर है।

 * नेतृत्व: गाँव का नेतृत्व ‘मुखिया’ या ‘पहान’ (धार्मिक प्रमुख) द्वारा किया जाता है।

 * महिलाओं की स्थिति: महिलाएँ अपेक्षाकृत स्वतंत्र और सम्मानित स्थान रखती हैं, और खेती, त्योहारों और सामुदायिक निर्णय लेने में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं।

आजीविका और पारंपरिक अर्थव्यवस्था

 * आधार: पारंपरिक रूप से, जनजातीय लोग खेती, शिकार, मछली पकड़ने और वन उत्पादों पर निर्भर करते हैं।

 * प्रमुख फसलें: वे धान, मक्का, कोदो, बाजरा और ज्वार जैसी फसलें उगाते हैं।

 * वन उत्पाद: शहद, महुआ, लाख, तेंदूपत्ता, बाँस और लकड़ी उनकी आजीविका का मुख्य आधार होते हैं।

7. जनजातीय आंदोलन, चुनौतियाँ और संरक्षण के प्रयास

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

जनजातीय समुदायों ने भारत की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 * प्रमुख विद्रोही: बिरसा मुंडा का उलगुलान (1899–1900) जनजातीय गौरव और स्वतंत्रता का प्रतीक है। तिलका मांझी, सिधु-कान्हू, अल्लूरी सीताराम राजू, और रानी दुर्गावती जैसे नायकों ने ब्रिटिश शासन और सामंती दमन के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी।

वर्तमान चुनौतियाँ और समस्याएँ (A Deeper Analysis)

आज भी जनजातीय समुदायों के सामने कई गंभीर चुनौतियाँ हैं, जिन पर ध्यान देना आवश्यक है:

 * विस्थापन: खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण जंगल और ज़मीन से बार-बार विस्थापन, जिससे उनकी पहचान और आजीविका छिन जाती है।

 * सांस्कृतिक क्षरण: शिक्षा की कमी और मुख्यधारा के अत्यधिक प्रभाव के कारण जनजातीय भाषाओं और कलाओं का तेज़ी से पतन।

 * स्वास्थ्य और पोषण: गरीबी, कुपोषण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव।

 सरकारी प्रयास और संरक्षण

भारत सरकार ने अनुसूचित जनजातियों के लिए कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम शुरू किए हैं:

 * कानूनी संरक्षण: वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act – FRA 2006) उन्हें उनके पारंपरिक वन भूमि पर अधिकार देता है।

 * आर्थिक सहायता: जनजातीय विकास निगम (Tribal Development Corporations) और ट्राइफेड (TRIFED) वन उत्पादों के विपणन में सहायता करते हैं।

 * शिक्षा: शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए छात्रवृत्तियाँ और एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) जैसी पहल।

8. निष्कर्ष: भारत की पहचान का मूल आधार

जनजातीय संस्कृति वास्तव में भारत की आत्मा है। यह हमें प्रकृति के साथ और एक-दूसरे के साथ सद्भाव में रहना सिखाती है। उनका योगदान केवल इतिहास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आज भी यह भारत की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध कर रहा है। उनके ज्ञान, प्रथाओं और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के तरीके आधुनिक दुनिया के लिए एक आवश्यक सबक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q. भारत में ‘जनजातीय गौरव दिवस’ कब मनाया जाता है?

जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा की जयंती के उपलक्ष्य में, भारत सरकार ने 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में घोषित किया है।

Q. जनजातीय समुदायों की पहचान के लिए संवैधानिक प्रावधान क्या है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366 (25) के तहत उन्हें अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) के रूप में मान्यता दी गई है।

Q. गोंड समुदाय के प्रमुख देवता कौन हैं?

गोंड समुदाय के लोग मुख्य रूप से प्रकृति की पूजा करते हैं, और उनके प्रमुख देवता जिन्हें वे पूजते हैं उन्हें “फेन पेन” कहा जाता है।

Read More Post 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!